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इरफ़ान सर की मौत को कई महीने हो गए हैं। बहुत से ऐसे वाकये होते हैं हमारे आसपास, जो हमें परत-दर-परत याद रह जाते हैं। इरफ़ान सर की मौत मेरे लिए कुछ वैसा ही है। उनके मौत से 1 दिन पहले मैंने उनकी हालत से जुड़ी खबर पढ़ी थी। मैंने मन में सोचा था जो इंसान कैंसर को हरा सकता है, वह किसी भी चीज को हरा सकता है। मगर मैं गलत था, हम हर चीज़ को नहीं हरा सकते और फिर मौत तो दुनिया का एकमात्र सच है।
अगले दिन खबर आती है कि इरफ़ान सर नहीं रहे। मुझे ऐसा लगा कि 2 मिनट के लिए सारी चीजें रुक सी गई हैं। ऐसा लग रहा था कि मेरे दिमाग ने इस खबर को समझने से मना कर दिया था। मैंने बहुत कोशिश करी, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। हर जगह ढूंढा इस आस में कि ये खबर मात्र एक अफवाह हो। मगर ऐसा नहीं था, खबर सच थी। मुझे आज भी याद है कि मैं अपने कमरे के किस कोने में बैठा था, क्या कर रहा था, और इस खबर को सुनने के बाद मैंने क्या किया था।
मेरा इरफ़ान सर से कोई रिश्ता नहीं था। मगर यह खबर एक चोट की तरह मुझे लगी थी। उनका जाना किसी अपने के जाने के बराबर लग रहा था। जब कोई अपना दुनिया में नहीं रहता तो जो महसूस होता है, मैं वो महसूस कर रहा था। बहुत देर बाद मैंने सच्चाई के साथ समझौता किया और हकीकत की तरफ लौटा।
जैसा कि मैंने कहा कि मौत दुनिया का एकमात्र सच है। ऐसा सच जिसे इंसान महसूस नहीं कर सकता। अगर कर भी सकता है तो आपको बता नहीं सकता है। इरफ़ान सर के जाने के बाद मैंने उनके बारे में पढ़ा उनका जन्म, पूरा नाम, उनके शौख, वगैरह-वगैरह। इसी दौरान मैंने एक गाना सुना नाम था, “मैंने दिल से कहा”। पहली दफा ये गाना नहीं सुन रहा था, लेकिन उस रोज़ इस गाने का मायना कुछ और था। यहां इसी गाने की बात हो रही है।
जिंदगी को हर कोई अपने तरीके से परिभाषित करता है। आपने भी कई ऐसे परिभाषाओं को पढ़ा होगा या हो सकता है कि आपकी खुद की एक परिभाषा हो। अच्छी बात है लेकिन मेरे लिए जिंदगी इकोनॉमिक्स की तरह है। यहाँ भी सप्लाई और डिमांड चलता रहता है। आप किसी चीज़ की डिमांड ज़िन्दगी से करते हैं और बदले में आपको किसी और चीज का सप्लाई मिलता है।
जब हमें हमारे मन मुताबिक चीजें नहीं मिलती, तो हम शिकायत करते हैं, रोते हैं, सिर पटकते हैं और बहुत सी चीजें करते हैं। यह सब करने के बाद कहीं ना कहीं हम समझौता कर लेते हैं। मान लेते हैं कि जो मिला है वही किस्मत थी, जो नहीं मिला वह किस्मत के बाहर की चीज थी। समझौता एक बहुत बड़ी चीज है और यह इंसान को बहुत छोटा बना देती है।
समझौता करते-करते इंसान बहुत कमजोर हो जाता है। इतना कमजोर हो जाता है कि उसे आसपास की चीजों की समझ भी नहीं होती। खालीपन की एक दीवार इंसान के चारों तरफ बन जाती है। ऐसी दीवार जिसे तोड़ना बहुत मुश्किल होता है। ऐसा लगता है कि वह दीवार किस्मत है और दीवार के बाहर की दुनिया किस्मत के बाहर की चीज। इंसान बाहर झांकने में भी डरने लगता है। बाहर की खुशियां भी शोर और मातम जैसे लगने लगती हैं। मन मार के अगर बाहर की दुनिया में चला भी जाए तो सुकून की तलाश में भाग कर अपने आशियाने की तरफ लौट आता है।
समझौतों से लड़ता हुआ इंसान काफी अप्रत्याशित हो जाता है। ऐसा लगता है कि वह अगले पल क्या कर बैठेगा, यह उसे भी नहीं पता होगा। मन में एक लड़ाई चलती रहती है। कुछ ऐसी लड़ाईयाँ जो चीजों के बीच में फ़र्क़ करना भी मुश्किल कर देती है। अच्छा-बुरा, सही-गलत, सब चीजों को एक तराजू पर तौलते हुए इंसान आगे बढ़ता जाता है, बिना किसी लक्ष्य के, बिना किसी उम्मीद के। आंख खोलो तो अंधेरा, बंद करो तो अंधेरा, मानो कि हर वक्त रात हो रही है और सवेरा कहीं दूर खड़ा है। अंग्रेजी में एक कहावत है, “there is light at the end of the tunnel” हिंदी में इसी को शायद कह सकते हैं कि हर डरावनी रात के बाद सवेरा होता है। लेकिन यहां कोई टनल नहीं है, यहां कोई लाइट भी नहीं है, कोई एंड भी नहीं है, अगर कुछ है तो वह डर। इस बात का डर कि अब कभी सुबह होगी भी या नहीं।

संगीत और ज़िन्दगी एक कोशिश है, ऐसी कोशिश जहाँ मैं अपने कुछ पसंद के गानों को ज़िन्दगी के साथ जोड़ कर पेश कर रहा हूँ। ये गाना इस कड़ी का पहला भाग है।
इसे आप यूट्यूब पर भी देख सकते हैं

अगर आपको कोई गाना बहुत पसंद हो या कोई ऐसा गाना जिसे ज़िन्दगी के साथ रख कर देखा जा सके तो उसका नाम ज़रूर बताएँ। शायद इस कड़ी का अगला भाग वो गाना बन जाए।

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