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बातों का कोई दायरा नहीं होता। इंसान जहाँ तक जाता है, बातें वहाँ तक जाती है। इंसान का कोई दायरा है? खैर कहानी जानवरों और बातों की है। इंसान पर फिर किसी और दिन। होता ये है कि एक जंगल में आग लगती है। कहाँ, क्यों, कैसे, कब का पता चलता उससे पहले सारे जानवरों ने जंगल खाली कर दिया। जिसको जहाँ जगह मिली वो वहाँ पहुँच गया, इस उम्मीद से कि जान बचा लेंगे। जानवर आपके या हमारे तरह नहीं होते। मज़ाक में आप किसी को कह सकते हैं कि पूरा जानवर है साला लेकिन इससे सामने वाला शख़्स जानवर बनता नहीं है। जानवरों को सिर्फ खुद से मतलब होता है, अपने सामान से, अपने रहने वाली जगह से या फिर societal-status से। जानवर बिलकुल इंसान जैसे नहीं होते, समझ गए? समझेंगे क्यों नहीं हम सब समझदार है।

खैर वापिस आते हैं। कहाँ थे हम? हाँ जंगल, आग, और जानवर जंगल से भाग जाते हैं। कुछ दिन बाद सारे जानवर जंगल में वापिस आते हैं। जंगल पहले जैसा ही था, मतलब बिलकुल पहले जैसा ही। अच्छा मतलब बिलकुल वैसा नहीं था लेकिन आग लगने के निशान दूर-दूर तक मौजूद नहीं थे। सारे जानवर भौंचक्के हो गए और एक दूसरे को address दिखाने लगे। कहने लगे कि location तो यही है मगर destination थोड़ी अलग-अलग सी महसूस हो रही है। जानवरों ने एक चूहे को रोका और उससे पूछा कि ‘जंगल ऐसा कैसे हुआ?’ चूहे ने पक्का कोई नशा किया था क्योंकि उसने कहा कि ‘जंगल की आग को उसने बुझाया’| सारे जानवर भौंचक्के हो गए और कुछ तो ये सुन कर बेहोश हो भी गए । ‘अरे सुनो सिर्फ आग नहीं बुझाई, जंगल को पहले जैसा भी मैंने ही बनाया है।’ ये सुन कर जो होश में बचे थे वो पागल हो चुके थे और जो बेहोश थे उनकी क्या ही बात करनी। जंगल में हाहाकार मच गया, जानवरों को भरोसा नहीं हो रहा था कि जादू देखा या सच। पूरा जंगल “चूहा, चूहा” की एक घनघोर आवाज़ से गूंज उठा। ऐसा मंज़र लोगों ने कम से कम पिछले कुछ सालों में तो नहीं देखा था। देखने वाले आज भी उस माहौल को “अद्भुत और अविश्वश्नीय” बताते हैं। एक जानवर ने तो कह दिया कि ‘भाईसाहब पिछले 60 सालों में ऐसा माहौल नहीं बना था कभी, चूहे ने मचा दिया है।’ थोड़ा खोजने पर पता चलता है कि चूहे को नशा इसी ने करवाया था।

खैर हर रात की एक सुबह होती है। चूहा नशे से उठा तो उसे किसी ने बताया कि असल में हुआ क्या था। चूहा खुद पर विश्वास करने को तैयार नहीं था। उसका तो मानो वो हो गया था कि “aim करते हैं 50K Likes के लिए” और अगली सुबह पूरा इंटरनेट मतलब जंगल उसके नाम पर वाह-वाही लूट रहा था।

जंगल की छोटी से बड़ी, सारी परेशानी अब चूहा ही देखता था और उपाय बताता था। जंगल का राजा अब चूहा था और शेर छुट्टी पर था। चूहे को कोई तकलीफ नहीं होती थी, उसके खाना पानी का विशेष ध्यान रखा जाता था। किसी की मजाल नहीं थी कि वो चूहे के खिलाफ कुछ बोल सके। सब कुछ हँसी- ख़ुशी का माहौल था। शांति और भाईचारे का तो अलग से ध्यान रखा जाता था। ऐसा माहौल कि आँख देख ले तो दिल पसीज जाए। जंगल के जानवरों की सारी लड़ाई अब चूहा लड़ता था। कम से कम लड़ता हुआ खुद को दिखाता तो था ही। हमेशा वो जानवरों की सेवा में लगा रहता था। वो कहाँ से आता था, कहाँ को जाता था, कब सोता था, कब जगता था किसी को इसका पता नहीं था।

एक दिन जंगल में फिर आग लगती है। इस बार जानवर जंगल छोड़ कर भागते नहीं है। उन्हें भरोसा था कि चूहा बचा लेगा। सब जानवर चूहे के बिल के सामने जा कर खड़े हो जाते हैं। कहानी समाप्त, कहानी को थोड़ा open-ended रखते हैं। आप समझदार है आगे कि कहानी अपनी आँखों से महसूस कर लीजिए।

बात ये है कि बहुत सी ऐसी लड़ाइयाँ होती है जो हमारी खुद कि होती है। ऐसी बहुत सी लड़ाइयाँ होती है जिन्हें हम खुद नहीं लड़ते। हमारी लड़ाई हमारे लिए कोई और लड़ता है और हम उसके बिल के सामने बस इंतज़ार करते रह जाते हैं। किसी चीज़ को सीखना एक कला है और हम सब कलाकार हैं। सीख लीजिए की लड़ा कैसे जाता है, जीता कैसे जाता है, हारा कैसे जाता है। समझिए की चोट लगती है तो पहले त्वचा निकलती है या माँस फटता है। महसूस करिए उन चीज़ों को जो महसूस करने लायक है। दुनिया की लड़ाई में जीतना कला है लेकिन उसमें संतुष्टि नहीं है। अपनी लड़ाई लड़ने में मज़ा भी है और कला तो वो है ही है।

1 Comment

  1. Parvesh Pandey

    बहुत खूब। आंखें खोलने वाला लेख।

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