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ये दुनिया कुछ वक़्त के लिए जैसे बंद कर दी गई थी। सड़क, दुकान या दफ्तर, हर जगह शांत और वीरान हो चुके थे। इंसान घरों में बंद पड़ा था और सड़क पर जानवर घूम रहे थे। हम उन जानवरों को देख कर इतना खुश हुए कि बस ख़ुशी के कारण पागल नहीं हुए। पागलपन से थोड़ा कम और ख़ुशी से बहुत ज़्यादा दूर की दूरी तो तय कर ही ली थी। जानवरों के बाद बारी आई आसमान की। आसमान तो पहले भी दिखते था मगर इतना साफ़ आसमान लोगों ने पहली बार देखा था। कई लोगों ने साफ़ आसमान के साथ-साथ पहाड़ तक देख लिया। अगर बात सिर्फ आसमान की होती तो हम अपना आपा नहीं खोते लेकिन पहाड़ दिख गया हमें और वो भी घर से बैठे – बैठे। फिर एक बार पागलपन की लहर दौड़ी और लोग फिर बहुत खुश हुए। जब आदमी के पास कुछ नहीं होता करने को तो मन बहलाने के लिए खुश हो जाना चाहिए। हमने मन भी काफी बहलाया और खुश भी बहुत हुए। मन बहलाने और ख़ुशी प्रकट करने के लिए जो एक मात्र ज़रिया है हमारे पास वो है social media. भर – भर के जानवरों और पहाड़ों की तस्वीरें साझा की गई। जानवर, पहाड़ और भी कई चीज़ें इस Eco-System का एक part है। पता है ना आप सबको? नहीं पता है, कहाँ पता है। (अगर ये पंक्ति सुर में पढ़ रहे हो तो बताना) जो चीज़ हमारे बीच का ही एक हिस्सा है उसे देख कर इतना खुश होने का मतलब कम से कम मुझे तो समझ नहीं आया। मगर फिर किसी इंसान ने कहा था कि खुश होने के लिए किसी बात का होना ज़रूरी नहीं है, इंसान बिना किसी बात के भी खुश हो सकता है। ये बात जिस शख़्स ने कही थी अगर वो आपको मिले तो मुझे भी बताना। बात फिर वही है कि Lock down ने क्या क्या नहीं दिखाया, तो एक ये चीज़ भी सही। 
ख़ैर मैं इस शहर में पिछले साल आया था। एक बहुत बड़ा शहर, मतलब काफी ही बड़ा शहर। सपनों का शहर, बुलंदियों का शहर, खूबसूरत शहर, शहरों का प्रचार कुछ इसी तरीके से किया जाता है। वैसे शहरों को ऐसे विज्ञापन की ज़रुरत भी है। वो इसलिए क्योंकि शहरों को बेचना होता है बहुत कुछ। जैसे लोगों के सपनों को, मासूमियत को, ताज़ी हवा को, इंसानियत को इत्यादि चीज़ें । शहर हमेशा कुछ ना कुछ बेचता ही रहता है। शहर की एक और खासियत है कि शहर हमेशा भागता रहता है और थकता भी नहीं है। एक शहर है जिसके लिए कहते हैं कि वो कभी सोता नहीं है। कुछ इसलिए भी आज-कल के शहर पागल हो चुके हैं। लेकिन शहर होते बहुत मज़बूत है, सब कुछ सह लेते हैं। मार-पीट, खून-खराबा या दंगे, शहर सब कुछ सह लेते हैं और अगली सुबह फिर दौड़ने लगते हैं। शहर ना दीवारों और मकानों से नहीं बनते। दीवारों और मकानों को तोड़ा जा सकता है। शहर कभी टूटते नहीं हैं, शहरों को खून से बनाया जाता है। उन्हीं लोगों के खून से जिन्हें कुछ वक़्त पहले शहर ने पैदल भागने को मजबूर कर दिया था।
मैं इस शहर में ना कुछ खरीदने आया था और ना ही कुछ बेचने। मेरे पास ऐसे सपने थे ही नहीं जिन्हें बेचा जा सकता था या फिर मेरे सपने इस लायक नहीं थे कि उन्हें ख़रीदा जा सके। मगर फिर भी मैं इस शहर में आया क्योंकि मेरे माँ-बाप के पास कुछ सपने थे। वो सपने जिसे ये शहर लपक के खरीदने को तैयार हो सकता था। एक ऐसा सपना जो इतना चमकदार था कि दो मिनट से ज़्यादा देख लो तो आँखें ख़राब हो जाए। शहर भी तो शायद इतने हीं चमकदार होते हैं।

10 Comments

  1. Deepika

    Beautiful <3

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    • Mayank srivastava

      Well written!!

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  2. bhawna jha

    बहुत खूबसूरत😊

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  3. Prince Singh

    It was as beautiful as always. But please use other font style for Hindi because there a little gap comes between shirorekha(the upper line). It makes the words look weird. Overall, your thoughts and imagination are amazing always:-)

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  4. Metali

    Beautifully written, as expected from you.
    Keep growing Mr Anand 🙂

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  5. suraj

    wowwww

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  6. Gayatri verma

    Beautifully imagined & written,one can relate#feel easily🌻keep it uppp🧔,waiting for chapter ✌

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  7. Sandhya

    दिल खुश कर दिया अंकित🖤

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    • Khushii

      Best one bhaiiii🖤❤️

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  8. Jyoti Chugh

    Best writer and Best Human being 😇

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